Sunday, June 24, 2012

कविता - संशय ..!

कविता - संशय ..! -अरुण वि देशपांडे -पुणे

by Arun V. Deshpande on Saturday, June 23, 2012 at 9:21am ·
कविता - संशय ..!                                               -अरुण वि देशपांडे -पुणे
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 मनात  नसावी
 जागा -संशयास ,
 प्रवेश कधीही
 याला  देऊ नका  ......!
 शत्रू  कोणताही
 वाईट  नेहमी
 परी विध्वंसक
 सगळ्यात हा ........!
 सुखात कालवी
 विष हा नेहमी    
 कोणत्या रुपात 
 भेटे भरोसा नाही......!   
 मनांचा विस्वास
 हाच असे खास
 या आधारे हो
 संशय दूर ठेवा ........!    
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  कविता - संशय ..!                                               -अरुण वि देशपांडे -पुणे
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कविता- संकल्प - समर्थ चरणापाशी ...! ||

कविता- संकल्प - समर्थ  चरणापाशी ...! ||                                                     अरुण वि.  देशपांडे  -पुणे                           
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दिवस एक  छान उजाडला
संकल्प मनाशी हो  योजिला
वंदन करुनी स्वामी समर्था
आरम्भ करूया वागण्याला........!||1 ||
दुखावतील कुणी बोलण्याने 
टोकदार  बोलायचे नाही
जिव्हारी लागेल कुणाच्या ते
झोंबणारे बोलयाचे नाही ........! || 2||
मनाच्या ओढीने यावीत हो
माणसे आपली म्हणवणारी
आपुलकी याच साऱ्यांची हो
 उमेद जगण्यास देणारी  ..........! || 3||
अडचणीत सापडता कुणी
मदतीस जावे त्याच्या सदा
हात करावे पुढती त्याच्या
संकटातूनी  बाहेर काढण्या ........!||4||
नित्य प्रार्थना करु आपण सारे
समर्थ चरणांपाशी हो
द्यावी सद्विवेकबुद्धी आम्हालागी
विचार आणि आमच्या आचरणाला ....!||5||

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कविता- संकल्प - समर्थ  चरणापाशी ...! ||                                             अरुण वि.  देशपांडे  -पुणे
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कविता- "मन आतुरले रे ..!

कविता- "मन आतुरले रे ..!                                                                       -अरुण वि .देशपांडे -पुणे
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रिमझिम रिमझिम सावन आला रे सखया
ये लवकरी, मन आतुरले रे तुज भेटाया ...|| धृ ||
विरहाचे दिवस संपले कसे आपले
आठवणी त्याच्या आता काढू नको या
 त्या एकल्या रात्री आता रे संपल्या
ये लवकरी, मन आतुरले रे तुज भेटाया ......||१||
सरले एकदाचे रे  क्षण दुराव्याचे
मनी रंग भरले रे गोड  मीलनाचे
ओढ जाणुनी मनाची माझ्या सखया
ये लवकरी, मन आतुरले तुज भेटाया ..........||२||
सहवासे  अधिक रंगते प्रीती मनांची
विरहाने वाढते खरी खुमारी प्रेमाची
जाणुनी घेऊ आपण दोघे अर्थ  सखया
ये लवकरी ,मन आतुरले रे तुज भेटाया .......||३ ||
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कविता- " मन आतुरले रे.......!                                                    -अरुण वि. देशपांडे -पुणे.
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Rimzim Rimzim

कविता - पाउस

कविता - पाउस                                                             -अरुण वि.देशपांडे -पुणे.
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कोसळावे कधी
भरले आभाळ
आतुरले सारे
उजाडलेले माळ..||
नाही भरवसा
लहरी पावसाचा
जीवनात नाही
जीवन याच्या मुळे..||
मेहेरबानी याची
नाही सगळीकडे
कुठे पूर- महापूर
दैना ती याच्यामुळे ....||
असले असेही
पाउस हवाच हो
आबादानी सारी
या    पावसामुळे .........||
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कविता -पाउस                                                        -अरुण वि.देशपांडे -पुणे
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Paus.."

कविता- फादर्स डे...!

कविता- फादर्स डे...!                                                                   -अरुण वि.देशपांडे -पुणे.
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आई आणि बाबा
आई आवडे की
आवडती बाबा ?
का विचारता बाबा ?.........!
प्रेम माया सारे
म्हणजे ही आई,
आधार दिलासा
हे म्हणजे बाबा ...............!
आजी आणि आबा
आई आणि  बाबा
सगळे असले
तर घर बाबा ...................!
बाबा बाबा -बाबा
थोड तरी थांबा
आज आहे "बाबा-डे "
केक घ्याहो बाबा ..............!
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कविता - फादर्स डे "...!                                                   -अरुण वि .देशपांडे -पुणे.

लेख- आठवणीत हरवणे ...|

|| श्री ||                                                                                     अरुण वि. देशपांडे -पुणे.
लेख- आठवणीत हरवणे ...|
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तुम्हा -आम्हा सर्वांच्या मनात आठवणीच -आठवणी साठ्लेया असतात .
"व्यक्ती तितक्या प्रकृती "- तसे आठवणींचे असते. कुणाच्या आठवणीत
काय असेल ? सांगता येत नाही.
"आठवणीत  हरवून जाणे "- हे आपल्या स्वभावातील हळवेपानाचे लक्षण आहे.
कारण आठवणी ह्या बहुतांशी " निकटच्या - आपल्याशा वाटणाऱ्या व्यक्तीशी
निगडीत असतात. त्या अनुषंगाने घडलेले "प्रसंग किंवा घटना " या आपल्या
मनात , स्मृतीपटलावर कायमच्या कोरल्या गेलेल्या असतात. सहाजिकच त्या
क्षणांना आपण कधीच विसरू शकत नाही."
हे पुन्हा पुन्हा आठवणे सुद्धा मनाला एक हळवे समाधान देणारे सुखच आहे."
मनाच्या हुरहुरत्या अवस्थेत "आठवणीत हरवून जाणे" ही हमखास घडणारी एक
मानसिक प्रक्रिया आहे.
"आपण आपल्यातच हरवून जाणे," आजूबाजूच्या दुनियेचा विसर पडून जाणे " असे
हे आठवणीत हरवून गेल्यावर होऊन जाते.
या  आठवणी "कधी डोळ्यांच्या कडा ओलावून टाकणाऱ्या असतात, कधी अस्फुट असे
हुंदके घशाशी आणणाऱ्या असतात." तर "कधी आठवणी मनाला नवी उमेद देतात ",
आठवणी पुन्हा ताज्या झाल्या की "मनाला हुरूप आल्या सारखे वाटून जाते."
"जुन्या जखमा कुरवाळीत बसणे..." म्हणजे "आठवणीत हरवून जाणे " एवढेच नसते.
"सहवासात येऊन  गेलेल्या माणसांना  भरली मनाने आठवणे "-ही सुद्धा आठवणी आहे.
"आपल्या हातून घडून गेलेल्या चुकांपासून बोध घेणे  आणि त्या
  दुरुस्त करण्याचा प्रयत्न करून पाहणे" हे ही घडून जाऊ शकते ते
केवळ "आठवणीच्या पाठबळावर ." कारण त्या घटना , ते घडून घेलेले
 प्रसंग " आपल्याला जीवनानुभव " देऊन गेलेले असतात. ते पुन्हा -पुन्हा
 आठवणे ' आणि मनाला "नव्याने काही शिकण्यास मिळणे ", हे आठवणींचे
आपल्या उपकारच आहेत ", असे म्हणावेसे वाटते.
 "एक- एकट्याचा एकांत - आणि आठवणी" यांचे अतूट असे नाते आहे. दूरवर
 नजर लावून विचारात गढून गेलेले कुणी दिसले के समजावे" आठवणीच्या
आठवणीत हरवून गेलेला दिसतेय स्वारी.'!
      " आठवणीचे ."-हे येणे
        झुल्यावारचे झुलणे
        हिंदोळ्यावर  झुलावे
        मनालागी सुखवावे .......||
 हे लेखन वाचून तुम्ही तुमच्या आठवणीत हरवून जाल हे नक्की .आणि कळवा
मला तसे.नमस्कार ,
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लेख- "आठवणीत हरवणे -                                              -अरुण वि. देशपांडे -पुणे
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कविता - रित- विपरीत

कविता - रित- विपरीत                                                    -अरुण वि .देशपांडे -पुणे.
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शब्द हे अवघे
भावनांचे रूप
कठोर मनाला
कशाचे अप्रूप ?.......|
फुटे का पाझर
दगडाला कधी ?
अश्रुंना बंद
डोळ्यांची दार .......!
मधुर बोलणे
बंद झाला छंद
फटकळ बोल
देतात आनंद ........!
मन वेडे भोळे
त्याला हे "ना - कळे
जगण्याची कशी
 रित- विपरीत..!......!

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कविता-- रित- विपरीत  .......!                                     -अरुण वि देशपांडे -पुणे
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